Thursday, 18 October 2012

कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की / अकबर इलाहाबादी

कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
शाम को बोसा लिया था, सुबह तक तक़रार की 

ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की

हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार[1] की
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की

ज़हर देता है तो दे, ज़ालिम मगर तसकीन[2] को
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की

बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों[3] ने गली में यार की

लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की

थूक दो ग़ुस्सा, फिर ऐसा वक़्त आए या न आए
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की

हाल-ए-'अकबर' देख कर बोले बुरी है दोस्ती
ऐसे रुसवाई, ऐसे रिन्द, ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की
शब्दार्थ:

↑ ग़ैर
↑ तसल्ली
↑ दोस्तों

Wednesday, 11 April 2012

कहानी


                          कहानी

                          परिचय

                                                              तिथि दानी

   बहुत क़रीब से देखा था मैंने उसे। उसका रंग-ढंग या रहन-सहन कहीं से भी यह अँदाज़ नहीं देता था कि सच्चाई उसके परे भी हो सकती है, जो दिखाई दे रही थी।
    तक़दीर शायद कभी-कभी कुछ मेहरबान होकर ,कुछ ऐसे ख़ुशगवार मौके दे जाती है जिसमें हमें ज़िंदगी के कुछ पुख़्ता राज़ मालूम हो जाते हैं। उस लड़की के व्यक्तित्व की कुछ गहरी परतें खोलने में, मैं क़ामयाब रही थी, इसलिए आजकल ऐसे एहसास मुझे कुछ ज़्यादा ही हो रहे थे। वह लड़की जब भी घर से बाहर निकलती, तो कोई भी पहली नज़र में उसे देखकर कह सकता था कि, भई वाह! परफैक्श्निस्ट हो तो ऐसा। दरअसल, वह और मैं, एक ही कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर थे। जो लोग उसे देखकर मुंह बिचकाते और आंखे तरेर लेते थे उन्हें भी, पास जाकर गुडमॉर्निंग कहना, वह कभी नहीं चूकती थी। ये लोग एक क्षणिक और नकली मुस्कान जवाब में देकर अपना काम चला लेते थे।
   कई दिनों तक यही सिलसिला जारी रहा, मैं बहुत ग़ौर से उस लड़की की भाव- भंगिमाओं को देखा करती थी और, उसे घूरती निगाहों को भी। अक्सर मैं दूसरों की निगाहों में वह पढ़ लेती थी उसके लिए, जो वह खुद नहीं पढ़ पाती थी। न जाने क्यों, कुछ ही दिनों के अंतराल पर मुझे अपने कॉलेज के स्टाफ रुम में बैठी अन्य महिलाओं के रूप में भी उस लड़की का अक्स नज़र आने लगा था। मुझे नहीं पता कि वाक़ई ऐसा हो रहा था या ये मेरी अपनी सोच का परिणाम था, लेकिन  बाकी सब, आसानी से बूझी जा सकने वाली पहेली जैसी उस लड़की की तरह नहीं थे। निशि, ज़ुबान और कान दोनों को मीठा लगने वाला सिर्फ उसका नाम नहीं था, क्योंकि मुझे भी वह गुड़ की तरह लगने लगी थी। उसके चेहरे की शोख़ी किसी नई नवेली नाज़ुक कली से ज़रा भी कम नहीं थी।
   उसका शरीर, चाहे महिला हो या पुरुष, हर किसी को, नज़र भर देखने पर मजबूर करता था। उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा चुम्बकत्व था कि अति शीघ्र लोग उससे एक गहरा जुड़ाव महसूस करने लग जाते थे और यही वजह थी कि हर क्लास में कुछ खास स्टुडेन्ट्स पूरी तरह से उसके मुरीद हो चुके थे।
   जितनी शीघ्रता से निशि अपने विद्यार्थियों के करीब हुई, उतनी ही शीघ्रता से कॉलेज के कुछ दिग्गजों और टटपुँजियों की आंखों की किरकिरी भी। उसकी निश्छल मुस्कान, उसका निष्कपट और ईमानदार व्यक्तित्व इन लोगों के दिलों के जंग लगे तारों को कहीं न कहीं झंकृत कर देता और ये अपनी आत्मा में झाँकने पर मजबूर हो जाते थे। इसलिए जो भयावह तस्वीर इन लोगों को दिखाई देती थी, उसका कारण कहीं न कहीं ये सभी निशि को मानते थे।
   जिस युग में उड़ते हुए ख़ूबसूरत पंछी के पर क़तर, उसे पिंजड़े में बंद कर दिया जाता है या फिर लज़ीज भोजन में तब्दील कर दिया जाता हो, वहां निशि जैसी लड़की की स्वच्छंदता भरी उड़ान अक्सर रद्द कर दी जाती है।
   कॉलेज परिसर के ग्रेनाइट की तरह चमकते और श्वेत लगने वाले चेहरे दरअसल सिर्फ आंखों को प्रिय लग सकते थे, मन को नहीं, इस बात से वह लड़की निशि, पूरी तरह अनभिज्ञ थी। कॉलेज परिसर में मंडराते कई चेहरों में से एक चेहरा, कॉलेज की प्रिंसिपल के काफ़ी क़रीब और प्रिय था। यह चेहरा था श्वेता का, जो अपने नाम को किसी भी रूप में चरितार्थ नहीं करती थी, यह बात वहां सभी जानते थे। वैसे तो श्वेता मैथ्स पढ़ाती थी,लेकिन अक्सर मैथ्स सॉल्व करते हुए उसका दिमाग़ नाना प्रकार की तिकड़मों में भिड़ जाता था और अचानक उसका पैन उसके माथे और कान के बीच टिक जाता था, यह सब देखकर उसके स्टुडेन्ट्स को यह भ्रम होता था कि शायद वह थ्योरम सॉल्व करते हुए बहुत गंभीर और स्थिर हो गई है। वे सभी आपस में बतियाते,फुसफुसाते और मंद-मंद मुस्काते जाते। इनकी खुसफ़ुसाहट के कंपन से श्वेता के हाथ से पैन छूट जाता और वह इस तरह बेचैन हो जाती, जैसे किसी ने गहरे पानी में रहने वाली मछली को ज़मीन पर ला पटका हो। इसलिए वह खीझती-झुंझलाती-सी कहती,  “चलो, अब ये खुसुर-फुसुर बंद करो। आज के लिए बहुत हो गई पढ़ाई। पता है, कितने सीरियस स्टुडेन्ट्स हो तुम लोग। यह थ्योरम हम कल सॉल्व करेंगे। सभी स्टुडेन्ट्स आश्चर्य से अपने मुंह बिचकाते और एक-एक कर क्लास से बाहर निकल जाते। फिर श्वेता, अपनी तिकड़मों को अंजाम देने की योजना बनाने में लग जाती।
   अगले दिन रोज़ की तरह निशि एक आइडियल असिस्टेंट प्रोफेसर की तरह कॉलेज में प्रकट हो चुकी थी। वह अपनी धुन में मस्त थी और स्टुडेन्ट्स को एक नया टॉपिक पढ़ाने की शुरूआत करने को बहुत उत्सुक थी, कि तभी प्रिसिंपल मैडम के एक और ख़ासमख़ास,पंड्या सर निशि के                  क़रीब आकर हुक़्म देते हुए बोले,” मैडम आज आपको बी.बी.. की क्लास नहीं लेनी है। निशि ने आश्चर्यचकित होते हुए तपाक़ से पूछा, “क्यों, क्या हुआ सर”? इस पर पंड्या जी का जवाब था, “मैडम दरअसल हम बी.बी.ए. में स्वाति मैडम को भेज रहे हैं। वह एक सप्ताह तक डैमो क्लास लेंगी।उनकी इस बात से निशि को कुछ ख़तरे के संकेत मिल रहे थे, असुरक्षा के एहसास ने उसे घेर लिया था। थोड़ा सिसकते हुए निशि ने पूछा, “तो क्या सर, अब मुझे वहां क्लास नहीं लेनी है। इस पर पंड्या सर बोले, “अरे नहीं मैडम, ऐसा नहीं है, हमने स्वाति मैडम को डैमो क्लास लेने को कहा है, अगर स्टुडेन्ट्स को, और हम सबको, वह सूटेबल लगीं, तो हम उन्हें अपॉइन्ट कर लेंगे, तो इस तरह से आपकी मदद भी हो जाएगी और आपके काम का बोझ भी हल्का हो जाएगा। यह कहकर पंड्या सर प्रिसिंपल के कमरे की ओर चले गए।
   पूरा एक सप्ताह बीत चुका था, स्वाति बी.बी.. की क्लास ले रही थी, फिर भी निशि ख़ामोश थी। बारह दिन बीत जाने पर निशि के धैर्य का बाँध टूटने लगा था। तभी पंड्या सर ने निशि को इशारा करके अपने पास बुलाया और एक अलग कमरे में ले गए। पंड्या सर का कहना था, “मैडम आज २५ तारीख है, १ तारीख से हमें आपको डिस्कन्टीन्यु करना होगा। यह वाक्य सुनते ही निशि का दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगा कि वह न केवल इसे महसूस कर पा रही थी बल्कि स्पष्ट सुन भी पा रही थी।
निशि की हालत को भांपते हुए पंड्या सर बोले, “देखिए मैडम, हम लोगों को तो आपके पढ़ाने का तरीका बहुत अच्छा लग रहा था, इसलिए हमने आपको अपॉइन्ट किया था, लेकिन कुछ स्टुडेन्ट्स आपके साथ एडजस्ट नहीं हो पा रहे हैंपर , मुझसे तो कभी किसी ने कोई शिक़ायत नहीं की। निशि ने लगभग साँस रोकते हुए कहा। पंड्या का कहना था, “देखिए मैडम, कॉलेज तो इन  स्टुडेन्ट्स से ही चलता है और फिर हमारे कॉलेज का तो उसूल है कि जो स्टुडेन्ट्स की पसंद पर खरा, वह हमारी कसौटी पर भी खरा। ठीक है तो, अब मैं चलता हूं। निशि ने गुस्से में कुर्सी के हत्थों को कसकर जकड़ लिया था। कुछ देर तक वह इसी मुद्रा में बैठी रही सोचती रही और इस अंजाम तक पहुंची कि अगले दिन वह खुद स्टुडेन्ट्स से बात करेगी कि आखिर उन्हें उससे क्या दिक्कत है।
निशि जब घर पहुंची तो रोज़ की तरह उसकी आवाज़ में खनक नहीं थी मां-बाप की लाड़ली इस बिटिया की असल हालत का अँदाज़ लगाने में, घर पर किसी को भी देर नहीं लगी। यहां तक कि घर पर काम करने वाली बाई ने भी निशि से पूछ लिया, “काय रानी! आज इतना मुंह क्यों लटका है, निशि ने बस इतना ही कहा, “नहीं तो, तुम तो और....  निशि के अंदर, डाइनिंग रुम तक पहुंचते ही उसकी मम्मी ने कहा,” चाय पी लो बेटा, बहुत अच्छी बनी है निशि के पापा भी उसी वक्त ऑफिस से लौटै थे, तो वह भी डाइनिंग रुम में ही चाय की चुस्कियां ले रहे थे और निशि के मन में होती हलचल को महसूस कर रहे थे। उनके कुछ पूछने से पहले ही निशि ने अपना सारा हाल अपने पापा से बयाँ कर डाला। पापा ने उसे सलाह भी दी और डांटा भी, अरे! तुम सच में बड़ी बेवकूफ़ हो, जब तुम्हारे सर, तुम्हें डिस्कन्टीन्यु करने की बात कर रहे थे तब तुमने उन्हें पेपर के उस विज्ञापन की याद क्यों नहीं दिलाई, जिसमें कहा गया था कि इंग्लिश विषय के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर की जरुरत है और अपॉइन्टमैन्ट यू.जी.सी. के इंटरव्यू से होना है। निशि ने हताशा भरे स्वर में कहा, “नहीं पापा, यह बात तो बिल्कुल मेरे ध्यान में नहीं आयी हां, तुम्हारे मामले में ऐसा होना, कोई नयी बात नहीं है। व्यंग्यात्मक स्वर में ऐसा कहते हुए वे उठकर अपने कमरे की ओर चल दिए।
   घड़ी की सुइयों की टिक-टिक निशि के कानों में चुभ रही थी और वह आने वाले कल के बारे में सोचते हुए कुछ देर चैन से, आँखें भी बंद नहीं कर पा रही थी। इसी दौरान फोन की घंटी ने निशि की विचार श्रृंखला को झटके से तोड़ा, उसके कान खड़े हो गए थे। वह ध्यान से सुनने लगी कि आख़िर, फ़ोन किसका है, किससे पापा इतनी तल्लीनता से बात कर रहे हैं? उसने सुना, पापा कह रहे थे, “बताइए इसके कॉलेज में इस तरह का रवैया चल रहा है। पापा के ऐसा कहते ही निशि को समझने में क्षणिक भी देर ना लगी कि ये भोपाल वाले दादाजी ही थे, जो रिश्ते में उसके पापा के मामाजी थे।
ये दादाजी बड़े रसूख़दार पत्रकार होने के साथ, मंत्री पद पर भी आसीन रह चुके थे। निशि जानती थी कि जब भी परिवार पर कोई संकट आता था, उसके वह दादाजी तारनहार साबित होते थे। वह यह सब याद कर ही रही थी कि तभी, पापा की आवाज आई... निशि बेटा, दादाजी का फोन है। निशि ने दौड़कर फोन रिसीव किया। दादाजी ने पूछा, “और बेटा क्या हालचाल है, जॉब कैसा चल रहा है। दादाजी का इतना पूछना था, कि निशि ने तत्परता से अपनी आप बीती कहना शुरू कर दी। सब कुछ सुनने के बाद दादाजी कुछ पल ख़ामोश रहे, फिर बोले, “बेटा, तुम्हें अपने स्टुडेन्ट्स से बात करनी चाहिए। जब तुम्हे भरोसा है तुमने अपने पढ़ाने और समझाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, तो तुम्हें उनको पूरी तरह अपने फ़ेवर में  लेना चाहिए
दादाजी के शब्दों ने निशि को कुछ इस तरह से राहत दी जैसे, मई की कड़ी धूप के दौरान अचानक घिर आए बादलों की बरसात से, खुले आकाश के नीचे काम करने वाले मजदूरों को मिलती है, जब बारिश की बूंदों के साथ उनके माथे पर जमी पसीने की बूँदें भी धुल जाती हैं।
   निशि का चेहरा अब निर्विकार हो गया था, उसकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक पैदा हो गयी थी। अगले दिन जब सुदृढ़ इरादों को लेकर निशि कॉलेज के गेट से अंदर प्रविष्ट हुई तो थोड़ी ही आगे, उसे कॉलेज प्रैसीडेंट और बी.बी.ए. का क्लास रेप्रेसेंटेटिव (सीआर) दोनों मिले। निशि ने इन्हें रोका, और कहा,” मैंने सुना है कि तुम लोगों को मुझसे शिकायत है। मैंने तो तुम लोगों को पहले ही दिन क्लियर कर दिया था कि कोई भी बात हो, कोई भी परेशानी हो किसी भी टॉपिक को लेकर, तो सबसे पहले मुझे बताना। मैं तुम लोगों की प्रॉब्लम हर तरह से सॉल्व करुंगी
   निशि का बोलना अनवरत काफी देर तक जारी रहा, पर बी.बी.. का सी.आर अपनी भौंहे चढ़ाए और ठुड्डी पर हाथ रखे, आश्चर्य से उसे सुनता रहा, वहीं खड़ा बबलू कमर पर हाथ रखे अपने उदास चेहेर के साथ अपनी आंखों को कॉलेज ग्राउंड के चारों ओर किसी धावक की रफ्तार से घुमाता रहा।
   किसी और से कुछ भी कहने से पहले तुम लोगों को मुझे बताना चाहिए था। इतना कहते ही उसकी आंखों में दृढ़ता से आकर, आंसू ठहर गए।
निशि को ख़ामोश होते देख, बबलू ने तपाक़ से बोलना शुरू किया। अरे मैडम ऐसा कैसे हो सकता है, हम लोगों को तो आपका पढ़ाना पसंद आता है बल्कि कल ही हम लोग डिस्कस कर रहे थे कि पहले जो इंग्लिश वाली मैडम थी वो हम जैसे हिंदी मीडियम स्टुडेन्ट्स को एक भी शब्द हिंदी में बोलकर नहीं समझाती थीं और निशि मैडम पहले हमें मिल गयी होतीं, तो आज हम सब काफी अच्छे मार्क्स से पास हो सकते थे। बबलू को समर्थन देते हुए प्रतीक बोला, “मैडम हम लोगों की क्लास से भी किसी ने कुछ नहीं कहा आपके खिलाफ़। बल्कि हम लोगों को भी आश्चर्य हो रहा था, कि आपके पढ़ाने की स्टाइल से हम सब फेमिलियर हो गए थे कि, अचानक पंड्या सर ने इन स्वाति मैडम को भेज दिया। यह स्वाति मैडम कोई और नहीं, बल्कि श्वेता मैडम की सगी बहिन हैं जो अभी-अभी इंग्लिश लिट्रेचर से एम.ए. करके आयी हैं। यह सब सुनते ही निशि को श्वेता की वह मुद्रा याद आ गयी, जिसमें उसकी आँखों से अग्निवर्षा होती थी, जब भी वह निशि से नज़रें मिलाती थी। प्रतीक का बोलना जारी था........ जानती हैं मैडम, कि कोई उनके क्लास में आने पर खड़ा ही नहीं हुआ था। जो भी समझा रही थीं, किसी की समझ में नहीं आ रहा था और हमारे किसी सवाल का तो, वह जवाब ही नहीं दे पा रही थीं। ये सारा बख़ान करते हुए प्रतीक की आंखों में ठीक वैसे ही भाव उभर रहे थे जैसे पुरानी फिल्मों के खलनायक चरित्र, जीवन की आँखों में उभर आते थे, जब वह किसी पर व्यंग्य कर रहे होते, और कुछ अज्ञात षड्यंत्र उनके दिमाग में चल रहा होता था। इसलिए निशि को प्रतीक की बातों पर उतना यक़ीन नहीं था, जितना कि बबलू पर। लेकिन बबलू ने भी स्वाति के श्वेता की बहिन होने की बात की पुष्टि की थी। वह जानती थी कि, बबलू और उसकी क्लास के दूसरे स्टुडेन्ट्स भी बहुत डीसेन्ट और सिन्सियर थे। निशि को ऐसा महसूस हो रहा था, मानो अब तक वह चक्रव्यूह में फंसकर अभिमन्यु की भूमिका अदा कर रही थी। लेकिन अब उसे चक्रव्यूह से बाहर आने का रास्ता पता चल चुका था।    
   ख़ैर! आज तो इस मामले को हर हाल में निपटाना है यह बोलकर निशि सीढिय़ों से कॉलेज के ऑफिस की ओर बढऩे लगी। बबलू और प्रतीक भी उसके पीछे चलते हुए आपस में बतियाते रहे कि, आज देखते हैं कि, साला कौन मैडम को ज़बरदस्ती परेशान कर रहा है। यह सब सुनकर निशि इतनी ख़ुश हुई कि चेहरे पर आती मुस्कान की रेखाओं को वह समेट न सकी, पर जैसे ही वह कॉलेज के ऑफ़िस के दरवाज़े पर पहुंची उसने अचानक अपनी मुद्रा में गंभीरता का समावेश किया। मे आइ कम इन मैम, कहकर वह कुछ सेकेंड दरवाजे पर ठिठकी रही। प्रिंसिपल मैडम, क्लर्क दुबेजी को कुछ समझा रही थीं। निशि ने कुछ ऊँचे स्वर में दोहराया, “मे आइ कम इन मैम। मैडम ने अंदर आने की अनुमति में, हाथ से इशारा किया। निशि अंदर प्रविष्ट हुई, तो वहीं बैठे पंड्या सर ने अपने गाल की मांसपेशियों को तकलीफ़ पहुंचाते हुए, एक चिर-परिचित मुस्कान बिखेरी, जो वह हमेशा बिखेरते थे। उन्होंने भी इशारे से, निशि को कुर्सी पर बैठने को कहा।
   निशि चुपचाप बैठ गई और प्रिंसिपल की, क्लर्क से चल रही बातों के समाप्त होने का इंतजार करने लगी। कुछ देर बाद क्लर्क दुबेजी वहां से चले गए फिर एक सेकेंड गँवाए बिना मैडम बोलीं, “देखिए मैडम, पंड्या सर पहले ही आपको सब बता चुके है अब मेरे कुछ कहने की गुंजाइश बाक़ी नहीं रह जाती है। आप ३० तारीख तक क्लास ले सकती हैं। निशि यह सुनकर, वहीं कुछ सेकेंड ख़ामोश बैठी, फिर मन ही मन कुछ योजना बनाते हुए अपनी बी.कॉम फाइनल की क्लास में जा पहुंची, जहां बबलू और बाकी स्टुडेन्ट्स उसका इंतजार कर रहे थे। निशि के अंदर प्रविष्ट होते ही सारे के सारे बहुत खुश होकर खड़े हो गए और वह एप्लिकेशन निशि को दिखाने लगे जो उन्होंने प्रिंसिपल के नाम इंग्लिश पढ़ाने के लिए, निशि की सिफ़ारिश के तौर पर लिखा था और उसमें सभी स्टुडेन्ट्स के सिग्नेचर थे।
   बबलू, निशि को पशोपेश की मुद्रा में देखकर बोला, “मैडम आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, मैने प्रतीक से भी बात कर ली है, वे सब भी आपकी सिफ़ारिश में एप्लिकेशन देंगे प्रिंसिपल मैडम को, कि उन्हें भी स्वाति मैडम से नहीं बल्कि निशि मैडम से ही पढऩा है। हम सब आपको यहां से जाने नहीं देंगे। इतना कहकर बबलू की मुस्कान स्थिर हो गयी।
   दिनभर कॉलेज में गहमागहमी का माहौल रहा, फिर शाम होते ही निशि को प्रिंसिपल रुम में बुलाया गया, जैसे ही निशि उनके रुम में पहुंची प्रिंसिपल ने निशि से नज़रें ना मिलाते हुए,किसी पेपर को देखते हुए कहा, निशि मैडम, आप १ तारीख के बाद भी कॉलेज में रहेंगी। यह सुनते ही निशि के कानों में फिल्म – जो जीता वही सिकंदर, का गीत,” नहीं समझे हैं वो हमें, तो क्या जाता है, हारी बाज़ी को जीतना, हमें आता है, ज़ोर-ज़ोर से बजने लगा।
   प्रिंसिपल बोलीं कि, “हमने स्वाति मैडम और आपके बीच वोटिंग करवाई थी स्टुडेन्ट्स से, तो आपको 4 वोट, स्वाति मैडम से ज्यादा मिले दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार की मुद्रा में टेबल पर रखकर, ऊपर-नीचे हिलाते हुए वह बोली, “इसलिए अब आप इसी कॉलेज में रहेंगी।चौपड़ की बिसात बिछा कर बैठीं, प्रिंसिपल को मजबूरन उसे समेटना पड़ा। निशि जानती थी कि, उसकी यह सफलता, वह ज्य़ादा समय तक बरक़रार नहीं रख सकेगी क्योंकि चील, गिद्ध की तरह झपट्टा मार के किसी के हिस्से को निगल जाना उसे नहीं आता था। चील-गिद्ध और बाज़ों की टोलियों के बीच से ही उसे, हंस की निर्मल, निरीह उड़ान भरनी थी।
   निशि को इंतजार था, चार महीनों बाद होने वाले यू.जी.सी. इंटरव्यू का, जिसे क्लियर करने पर उसे इस कॉलेज से कोई नहीं निकाल पाता।
यू.जी.सी. के इंटरव्यू का दिन आ चुका था अपने कॉलेज से इंग्लिश लेंग्वेज के लिए वह अकेली कैंडिडेट थी, बाकी सात लोग अलग-अलग जगहों से थे, जिनका बायोडाटा निशि के अनुभव और योग्यता की तुलना में फीका था। निशि इंटरव्यू देकर बाहर निकली तो बहुत ख़ुश थी उसने सबसे पहले मुझे, जिसको वह अपना अंतरंग मित्र मानने लगी थी, आकर बताया था कि उसने पैनल के सभी सवालों के सही जवाब दिए हैं और उसे पूरी  उम्मीद है कि वह सिलैक्ट जरूर होगी। एक और उल्लेखनीय बात जो उसने बतायी थी ,वह यह थी कि उस पैनल में कॉलेज की प्रिंसिपल साहिबा भी मौजूद थीं। इस सबके बावजूद उसके आत्मविश्वास से मैं बहुत प्रभावित थी और मैं जानती थी कि वह जो भी बोल रही थी उसमें कोई झूठ या बनावट नहीं थी।
   कुछ समय बाद सभी विषयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के अपॉइन्टमैन्ट के लिए हुए यू.जी.सी. के इंटरव्यू के नतीजे आ गए थे कॉलेज के सभी कैंडिडेट सिलेक्ट हो चुके थे, लेकिन सिर्फ इंग्लिश लैंग्वेज का इंटरव्यू रद्द हो गया था। निशि का चेहरा भाव विहीन दिख रहा था, वह समझ गई थी कि आखिरकार उसका हिस्सा चील गिद्ध और बाज़ों की टोली के झपट्टे का शिकार बन चुका है। राजनीति को अपने निजी जीवन में उसने पहचान लिया था।
   निशि इतनी निराश मुद्रा में नज़र आ रही थी कि, उसकी चाल कुछ असामान्य हो गयी थी। अपनी गाड़ी पार्क कर, जब वह कॉलेज ग्राउँड पार करते हुए अँदर जा रही थी तो उसकी नज़रें नीचे पड़ी कॉन्क्रीट पर जम रही थीं। शायद वह अपनी आने वाली ज़िंदगी की तुलना उनसे कर रही थी।
   निशि जब कॉलेज की ऊपरी मँज़िल तक पहुँची तो उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी रेगिस्तान में है और उसे अचानक कोई गुप्त झील नज़र आ गयी है और उसका गला तर हो गया है। दरअसल, बबलू और प्रतीक के साथ सारे कॉलेज स्टुडेन्ट्स प्रिंसिपल के कमरे के बाहर इकट्ठे थे और ज़ोर-शोर से नारेबाज़ी करते खड़े थे। वे सभी निशि की फिर से बहाली किए जाने की माँग कर रहे थे। उसी क्षण उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे सकारात्मकता का एक प्रभामंडल न केवल उसके शरीर को बल्कि सारे वायुमंडल को घेर चुका है। उसके साथ-साथ मुझे भी समझ आ चुका था कि तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद भी ज़िंदगी शेष रहती है। पर ना जाने क्यों, उसकी आँखों से आँसू छलकने को इतने तत्पर क्यों थे। वो आँसू तो ज़मीं पर गिरते लेकिन सारा आसमां उनकी ओर झुका जा रहा था। इतनी दिलचस्प है ये बात कि इस दौर में, उसे देखते-समझते मैं भी जीवन से परिचित हो चली थी। उस दिन यह सब, मुलाक़ात पर, मैंने उसकी आँखों में, और उसने मेरी आँखों में देख लिया था।

Thursday, 2 February 2012


बिन सोच विचार यहाँ लोग कुछ भी कहते है
तो उसे स्वीकारा जाता है 
स्वीकारने में भी कहीं न कहीं स्वार्थ तलाशा जाता है  
चापलूसों का ही दुनिया में वजूद होता है 
दौड़ सब तरफ जारी है 
जी हुजूरी का बेहतरीन मौका भी  हर कोई कहाँ पाता है 
यह हम जैसे लोगों को बार बार समझाया जाता है